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उद्देश्य उम्मीद उम्र


"ऊ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



एकता


"ऐ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ओ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"औ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



क़ब्र कमजोरी कर्म कलम कवि काँटा कामना कामयाब कारगिल विजय दिवस किताब किसान किस्मत कुदरत कृष्ण जन्माष्टमी


ख़ामोशी खुशबू खुशी खेल ख़्याल ख़्वाब


ग़म गरीब गाँधी जयंती गाँव गुरु पूर्णिमा गैर


घर


चन्द्रशेखर आजाद चाँद चाय चाहत चिंता चुनाव चुनौती चूड़ियाँ चेहरा चैन


छठ पर्व छाँव


जनता जमाना जमीन जल जवानी जान जानकारी ज़िंदगी जीवन


"झ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ट" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



"ठ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



डर डोली


"ढ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



तन्हा तारा तिरंगा तीज तीर्थ तुलसीदास


"थ" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।



दर्द दान दिल दिवाली दीया दीवाना दुःख दुर्घटना दुश्मन दुश्मनी दुष्कर्म दूर देर देश देशभक्ति दोस्ती दौर


धन धनतेरस धरती धूप धैर्य


नज़र नफ़रत नव वर्ष नवरात्रि नाग पंचमी नारी नास्तिक निर्णय निंद न्याय


पक्षी पत्थर परछाई परवाह परिवर्तन परिवार पर्यावरण पशु पहचान पास पिता पितृ पक्ष पूजा पूर्णिमा पृथ्वी पेड़ पौधे प्यार प्रकृति प्रतीक्षा प्रार्थना प्रिय प्रेम प्रेमचंद प्रेरक


फरिश्ता फूल फौजी


बचपन बच्चे बहन बाघ बात बाबा साहब बारिश बुद्ध पूर्णिमा बूढ़ी बेटी बेरोजगारी बेवफ़ाई


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क्ष

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"त्र" से अभी कोई विषय मौजूद नहीं है।


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सलिल सरोज

सलिल सरोज

3 मार्च, 1987

बारे में


श्री सलिल सरोज जी का जन्म 03 मार्च, 1987 को बिहार के नौलागढ़ गाँव, जो कि बेगूसराय ज़िले में आता है, में हुआ। पिताजी की छत्रछाया और स्वयं की रुचि की वजह से नौजवान श्री सलिल सरोज जी में

विता लेखन और साहित्यिक कृत्यों को आत्मसात करने का अंकुर फूटा। अपने विद्यालय के प्रारम्भिक समय से ही श्री सलिल सरोज जी ने कविताएँ लिखनी शुरू कर दी थी जो आज दो दशकों में ना केवल इनका शौक बन चुका है बल्कि अपनी आत्मा को तृप्त करने का अमूल ज़रिया भी। सलिल सरोज जी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से रूसी भाषा में स्नातक और इग्नू से समाजशास्त्र में परास्नातक कर चुके हैं और अभी लोक सभा सचिवालय, नई दिल्ली में कार्यकारी अधिकारी के पद पर सुशोभित हैं, जिसकी परीक्षा में इन्होनें अखिल भारतीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया और अपनी जन्मभूमि का मान-सम्मान बढ़ाया। इनकी रचनाएँ प्रतिदिन के आधार पर देश के लगभग सभी राज्यों के हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों, पत्रिकाओं और वे पत्रिकाओं पर प्रमुखता से लगती रहती हैं। श्री सलिल सरोज जी आज कविताओं से आगे बढ़ कर ग़ज़ल, नज़्म, लेख, कहानी और संस्मरण भी लिखते हैं। इनके साक्षात्कार पत्रिकाओं में छपते हैं जो भावी रचनाकारों और विशेषकर युवाओं को प्रेरित करते हैं। इन्होने अपनी लेखनी से गुलज़ार साहब को भी प्रभावित किया है और आरूषी फाउंडेशन, भोपाल के द्वारा विकलांगों पर आयोजिय काव्य प्रतियोगिता में अखिल भारतीय 20वां स्थान प्राप्त किया जिसका निर्णय स्वयं गुलज़ार साहब ने किया था। अब तक श्री सलिल सरोज जी 1200 कविताओं, ग़ज़लों, नज़्मों, 1000 शेरों, 100 से ज़्यादा अंग्रेजी और हिंदी में लेखों, 15 कहानियों के द्वारा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। श्री सलिल सरोज जी लगातार 10 वर्षों से बिना रुके और बिना झुके लेखन का कार्य पूरी स्वतंत्रता से बिना किसी प्रकाशक और किसी अन्य के दवाब में आए बिना कर रहे हैं, जो इनकी लेखन के प्रति ईमानदारी को बरबस दर्शाती है। इनका मानना है "आपकी लेखनी तब तक ही जीवित है जब तक आपकी ग़ैरत बरक़रार है।"

"लगा दो कर्फ्यू मेरे ज़हन में,
कि मेरी सोच भी बग़ावती है।"

कविता (1)



आलेख (1)



निबंध (1)



            

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